लेखक: जमाल अब्बास, एडिटर-इन-चीफ, क़ौमी ख़बरें
हौज़ा न्यूज़ एजेंसी | अज़ादारी केवल कर्बला के शहीदों के ग़म को मनाने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह एक क़ौम की सक़ाफ़ती विरासत भी है। अमरोहा की अज़ादारी का महत्वपूर्ण पहलू मातमी जुलूस हैं, जो अपने अज़ाई सामान, अनुशासन, व्यवस्था और पारंपरिक शालीनता से सुसज्जित होते हैं। तीन मुहर्रम से आठ मुहर्रम तक विभिन्न इमामबाड़ों से निकलने वाले मातमी जुलूस शबीह-ए-ताबूत, शबीह-ए-ज़ुलजनाह और अलमों के बिना अधूरे माने जाते हैं। इन अज़ाई सामान की तैयारी अपने आप में एक आध्यात्मिक सेवा है, जिसे कुछ विशेष लोग ही अंजाम देते हैं।

शबीह-ए-ताबूत और शबीह-ए-ज़ुलजनाह बनाने वाले लोग अपने बुज़ुर्गों की विरासत को भी संभाल रहे हैं और अज़ाई सेवा के माध्यम से इमाम-ए-मज़लूम से अपनी मोहब्बत और श्रद्धा व्यक्त कर रहे हैं। ताबूत और दुलदुल की तैयारी तथा कमंडे के अलमों की सजावट जैसी सेवाएँ पर्दे के पीछे की जाने वाली गतिविधियाँ हैं, जो जुलूस के दौरान दिखाई देती हैं। ये सेवाएँ केवल कुछ ही लोगों के हिस्से में आती हैं और अलग-अलग तारीखों के जुलूसों के अनुसार की जाती हैं।

बाकर मुन्तज़िर (जिन्हें हकीम चाँद भी कहा जाता है) तीन मुहर्रम, पाँच मुहर्रम, आठ मुहर्रम और दस मुहर्रम के ताबूत और ज़ुलजनाह तैयार करते हैं, जबकि शायर-ए-अहलेबैत हुसैन रज़ा चार मुहर्रम, छह मुहर्रम और सात मुहर्रम के जुलूसों के लिए यह सेवा निभाते हैं। इंतज़ार हुसैन हर तारीख के जुलूस की तैयारी में शामिल रहते हैं। हकीम चाँद ने अपने नाना मरहूम सियादत मदद की विरासत संभाली है, जो अब नाती को मिली है। इसी तरह हसन रज़ा की विरासत उनके बड़े बेटे क़ासिम रज़ा की जगह छोटे बेटे हुसैन रज़ा को मिली है।

हकीम चाँद बचपन से अपने नाना के साथ और हुसैन रज़ा अपने पिता हसन रज़ा के साथ जुड़े रहे और हर काम को ध्यान से देखते थे। अब बुज़ुर्गों के निधन के बाद ये लोग धार्मिक कर्तव्य समझकर ये ज़िम्मेदारियाँ निभा रहे हैं।

ताबूत और ज़ुलजनाह की चादर और झंडों को एक विशेष रंग से रंगा जाता है, जो खून के रंग जैसा होता है। पुराने समय में जुलूस के लिए इंतज़ाम करने वाले मुतवल्ली ढाई रुपये रंग आदि के लिए देते थे, जो बाद में दस रुपये हो गया, लेकिन अब हकीम चाँद ये खर्च स्वयं उठाते हैं। एक ताबूत पर लगभग साढ़े छह मीटर कपड़ा लगता है। हर तारीख के जुलूस के ताबूत की बनावट एक जैसी नहीं होती; तीन और आठ मुहर्रम का स्टाइल समान होता है, छह मुहर्रम का अलग, और चार व सात मुहर्रम का स्टाइल भी समान होता है। छह मुहर्रम का ताबूत सबसे बड़ा होता है और उस पर अधिक कपड़ा लगाया जाता है। ताबूत पर अम्मामा और कुरआन-ए-मजीद भी रखा जाता है।

ज़ुलजनाह की चादर लगभग सात मीटर लंबी होती है। पहले केवल ज़ुलजनाह को सजाया जाता था, लेकिन अब ताबूत को भी चाँदी के गहनों से सजाया जाने लगा है। कुछ मोमिन इस पर आपत्ति जताते हैं कि ताबूत शहीद के जनाज़े का प्रतीक है और जनाज़े को सजाया नहीं जाता।

कमंडे के अलम की सजावट भी एक कला है, जिसे हर कोई नहीं कर सकता। हुसैन रज़ा इस काम में माहिर हैं और उन्होंने कई युवाओं को यह काम सिखाया भी है। यह बात प्रशंसनीय है कि अमरोहा की अज़ादारी की परंपरा को नई पीढ़ी बहुत जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ा रही है।
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